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अश्क़ों की नमी और यादों की हवा

अश्क़ों की नमी और यादों की हवा ने
बरसों तक मुझ पर यूँही जंग लगाया

दिल का मेरे ओ सनम, है ये कैसा आलम
चाहकर भी मैं तुझसे जुदा न हो पाया

जिक्र जब भी होता है, तेरा ही तो होता है
बातों में मेरी तू कुछ इस तरह समाया

सफ़र तो कई हुए, ना हुआ हमसफ़र कोई
टूटे मन को मेरे इक तू ही तो छू पाया ।

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जुदा शायरी

अश्क़ों की नमी और यादों की हवा ने
बरसों तक मुझ पर यूँही जंग लगाया

दिल का मेरे ऐ सनम, है ये कैसा आलम
चाहकर भी ये तुझसे जुदा न हो पाया

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जो भी होता है हमेशा अच्छे के लिए होता है।

कभी कभी हमारा बुरा हमारे अच्छे के लिए होता है
तक़दीर का फैसला तो सदा अच्छे के लिए होता है।

उम्मीद पर तो दुनिया कायम है, तू भी उम्मीद रख
सीने में ये जुनून आमादा अच्छे के लिए होता है।

मन्ज़िल है तो मिल ही जाएगी, एक न एक दिन आख़िर
कुछ कर जाने का इरादा अच्छे के लिए होता है।

खुद को पाकर ही तूने, खुद पर ऐतबार किया है
खुद से किया हुआ वादा अच्छे के लिए होता है।

याद रहे न रहे कुछ भी, बस इतना तू याद रख
के जो भी होता है हमेशा अच्छे के लिए होता है।।

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दर्द सुनकर मेरे, फिर वाह कहता है

शख़्सियत को मेरी लापरवाह कहता है
वो दर्द सुनकर मेरे, फिर वाह कहता है

मन्ज़िल की तलब तो उसे भी होती होगी
राहों को जो अपनी खुद हमराह कहता है

दूर होकर भी न जाने क्यों दूर नहीं होता है
हमदम वो साथ मेरे कुछ इस तरह रहता है

कुछ तो बात ज़रूर होगी उसकी बातों में
यूँही तो नहीं शख़्स कोई वाह वाह कहता है ।

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दुआओं में मांगा जिसे, क्या वहीं हो तुम

दुआओं में मांगा जिसे, क्या वहीं हो तुम
शिद्दत से चाहा जिसे, क्या वहीं हो तुम

रातों में ढ़लते हुए, जलते हुए, मचलते हुए
ख़्वाबों में देखा जिसे, क्या वहीं हो तुम

क़लम को थामे हुए, दर्द वो सब आधे हुए
ख़यालों में सोचा जिसे, क्या वहीं हो तुम

पहली ही नज़र में, दर्द की भरी दोपहर में
मन ने मेरे छुआ जिसे, क्या वहीं हो तुम

पलकों के इस घर में, अश्क़ों के सफर में
सीने में छुपाया जिसे, क्या वहीं हो तुम

बनती हुई बिगड़ती हुई, रूठी हुई तक़दीर में
रब ने मेरे लिखा जिसे, क्या वहीं हो तुम।

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ग़मों से भरा हुआ दिल

तन्हाई को भी तन्हाई खलने लगी है
ये कैसा आलम है, ये कैसी खलिश है

ग़मों से भरा हुआ दिल, ग़म ही ढूँढता है
खुशियों की आहट से भी सहम जाता है

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आँखों में अनदेखी सूरत

किसी ने गलतफहमी तो किसी ने नफ़रत पाल रखी है
पता नहीं क्यों इस दिल ने तुम्हारी हसरत पाल रखी है

कहते हो हमेशा यहीं, के मिलते नहीं हो तुम कभी
तुम्हें क्या पता हमने तुमसे मिलने की चाहत पाल रखी है

बदल जाती हैं हर चीज, वक्त के साथ बेशक यहाँ
नहीं बदल पाए कभी जो, ऐसी कोई आदत पाल रखी है

ख़्वाबों की चारदीवारी में, नींद की उस बेदारी में
बरसों से इन आँखों ने अनदेखी कोई सूरत पाल रखी है।

 

~ By Shayari.me